द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् ।

द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् ।
धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम् ॥

There are two kinds of people that deserve to be pushed into deep seas with a heavy stone tied to them – the wealthy who do not do charity, and the poor who do not work hard.

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यः स्वभावो हि

य: स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रम: श्वा यदि क्रियते राजा तत् किं नाश्नात्युपानहम् ||

जिसका जो स्वभाव होता है, वह हमेशा वैसाही रहता है। कुत्तेको अगर राजा भी बनाया जाए, तो वह जूतें चबाना नही भूलता।

Whatever be the nature of a person, it is always Hard to change. If a dog is appointed as King, even then he will not stop biting shoes. ( he will keep on doing all the inferior things)

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न ही कश्चित् विजानाति

न ही कश्चित् विजानाति
किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि
कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥

Nobody knows, tomorrow what will happen to whom. Therefore, the wise, finish tomorrow’s work today itself.

कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है ॥

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वैद्यराज नमस्तुभ्यम।।।

वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर ।
यमस्तु हरति प्राणान् वैद्यो प्राणान् धनानि च ॥

हे वैद्यराज, यम के भाई, मैं आपको प्रणाम करता हूँ .यम तो सिर्फ प्राण हर लेते है पर आप धन और प्राण दोनों हर लेते हो !!
O vaidya (doctor), brother of Yama(God of Death), I bow down of you. Yama only steals away one’s life, but the vaidya steals one’s life as well as money.

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कोऽन्धो योऽकार्य

कोऽन्धो योऽकार्यरतः
    को बधिरो यो हितानि न श्रुणोति ।
को मूको यः काले
    प्रियाणि वक्तुं न जानाति ॥

He is blind who is busy in wrong deeds. He is deaf who does not heed to good advice. He is dumb who does not know to tell good words at the right time.

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जीवनं तर्पण

#WorldWaterDay
#SaveWater
जीवनं तर्पणं हृद्यं ह्रादि बुद्धिप्रबोधनम् । तन्वव्यक्तरसं मृष्टं शीतं लघ्वमृतोपमम् ।।
गंगाम्बु नभसो भ्रष्टं स्पृष्टं त्वर्केन्दुमारुतैः । हिताहितत्वे तद्भूयो देशकालावपेक्षते ।।”
(अष्टांगहृदयम्–5.1-2)

आकाश से गिरा हुआ गंगा का जल जीवन , तर्पण, हृदयहितकारक, आनन्दायक, बुद्धि को बढाने वाला, तनु , अव्यक्त रस , मृष्ट, शीतल, हलका और अमृतसमान  होता है । यह जल सूर्य, चन्द्र तथा वायु के स्पर्श  से देश एवं काल प्रभाव से हितकर या अहितकर भी हो सकता है !

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कोटरान्तः स्थिते

कोटरान्तः स्थिते वन्हिस्तरुमेकं दहेत्खलु  |
कुपुत्रस्तु  कुले  जातः स्वकुलं नाशयेत्यहो  ||
सुभाषितरत्नाकर

Meaning:
Oh ! while a fire inside a hollow of a tree burns only that tree,
even one wicked and aberrant son born in a family ruins the entire household.

एक वृक्ष के भीतर लगी आग सिर्फ उसी वृक्ष को नष्ट करती है न की वृक्ष के संपूर्ण कुल का ! परंतु एककुल में उत्पन्न कुपुत्र संपूर्ण कुल का नाश कर देता है !

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छायां ददाति शशिचन्दनशीतलां यः

छायां ददाति शशिचन्दनशीतलां यः सौगन्धवन्ति सुमनांसि मनोहराणि ।
स्वादूनि सुन्दरफलानि च पादपं तं छिन्दन्ति जाङ्गलजना अकृतज्ञता हा ।।

जो वृक्ष चंद्रकिरणों तथा चंदन के समान शीतल छाया प्रदान करते है, सुन्दर एवं मनमोहक पुष्पों से वातावरण सुगंधी बनाते है, आकर्षक एवं स्वादिष्ट फलों को मनुष्यो पर न्यौछावर करते है, उस वृक्ष को जंगली असभ्य लोग निर्दयता से काट डालते हैं । अहो मनुष्य की यह कैसी कृतघ्नता (अकृतज्ञता) है ??

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पुष्पिताः फलवन्तश्च

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।
वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च ॥
~महाभारत, अनु

फल और फूलोंवाले वृक्ष मनुष्यको तृप्त करते है । वृक्ष देनेवाले अर्थात वृक्षरोपन व संवर्धन करने वाले मनुष्य का तारण परलोकमे भी करते है।

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सेवितव्यो महावृक्ष:

सेवितव्यो महावृक्ष: फलच्छाया समन्वित: ।
यदि दैवाद् फलं नास्ति, छाया केन निवार्यते ॥

अर्थ: – फल और छाया देनेवाले महान् वृक्ष की सेवा  अर्थात   वृक्षारोपण  तथा उसका संरक्षण करना चाहिए , यदि अपने भाग्य में फल नहीं आये तो छाया कौन लेकर जा  सकता है ?

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सेवितव्यो महावृक्ष: फलच्छाया समन्वित: ।
यदि दैवाद् फलं नास्ति, छाया केन निवार्यते ॥12॥

अर्थ: – फल और छाया देनेवाले महान् वृक्ष की सेवा अर्थात वृक्षारोपण तथा उसका संरक्षण करना चाहिए , यदि अपने भाग्य में फल नहीं आये तो छाया कौन लेकर जा सकता है ?